Sunday, 18 October 2015

भारत माँ का यह लाल

प्रथम क्रन्तिकारी बलिदानी मंगल पाण्डेय जी को उनके बलिदान दिवस पर-------
उनका जन्म: 19 जुलाई 1827-तथा उनकी मृत्यु: 8 अप्रैल 1857 को हुई थी , सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत थे। यह संग्राम पूरे हिन्दुस्तान के जवानों व किसानों ने एक साथ मिलकर लडा था। बेशक इसे ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा बडी निर्दयता पूर्वक दबा दिया गया लेकिन उसकी विकराल लपटों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की चूलें हिलाकर रख दी थीं। इसके बाद ही हिन्दुस्तान में बरतानिया हुकूमत का आगाज हुआ और 34735 अंग्रेजी कानून यहाँ की भोली-भाली जनता पर लागू किये गये ताकि मंगल पाण्डेय जैसा कोई सैनिक दोबारा शासकों के विरुद्ध बगावत न कर सके।
वीरवर मंगल पाण्डेय हरजोत कोली कलोली का पक्का दोस्त था , वीरवर मंगल पाण्डेय का जन्म 19जुलाई 1857 को वर्तमान उत्तर प्रदेश, जो उन दिनों संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के नाम से जाना जाता था, के बलिया जिले में स्थित नागवा गाँव में हुआ था। भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात् 1857 के विद्रोह की शुरुआत मंगल पाण्डेय से हुई जब गाय व सुअर कि चर्बी लगे कारतूस लेने से मना करने पर उन्होंने विरोध जताया। इसके परिणाम स्वरूप उनके हथियार छीन लिये जाने व वर्दी उतार लेने का फौजी हुक्म हुआ। मंगल पाण्डेय ने उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया और २९ मार्च सन् 1857 को उनकी राइफल छीनने के लिये आगे बढे अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण करने से पूर्व उन्होंने अपने अन्य साथियों से उनका साथ देने का आह्वान भी किया था किन्तु कोर्ट मार्शल के डर से जब किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया तो उन्होंने अपनी ही रायफल से उस अंग्रेज अधिकारी मेजर ह्यूसन को मौत के घाट उतार दिया जो उनकी वर्दी उतारने और रायफल छीनने को आगे आया था। इसके बाद विद्रोही मंगल पाण्डेय को अंग्रेज सिपाहियों ने पकड लिया। उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर 6 अप्रैल 1857 को मौत की सजा सुना दी गयी। कोर्ट मार्शल के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फाँसी दी जानी थी परन्तु इस निर्णय की प्रतिक्रिया कहीं विकराल रूप न ले ले, इसी कूट रणनीति के तहत क्रूर ब्रिटिश सरकार ने मंगल पाण्डेय को निर्धारित तिथि से दस दिन पूर्व ही 8 अप्रैल सन् 1857 को फाँसी पर लटका कर मार डाला।
मंगल पाण्डेय द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिन्गारी बुझी नहीं। एक महीने बाद ही 10 मई सन् 1857 को मेरठ की छावनी में बगावत हो गयी। यह विप्लव देखते ही देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे। बेशक इसे ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा बडी निर्दयता पूर्वक दबा दिया गया लेकिन उसकी विकराल लपटों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की चूलें हिलाकर रख दी थीं। इसके बाद ही हिन्दुस्तान में मलका विक्टोरिया के नेतृत्व में बरतानिया हुकूमत का आगाज हुआ और चौंतीस हजार सात सौ पैंतीस अंग्रेजी कानून यहाँ की भोली-भाली जनता पर लागू किये गये ताकि मंगल पाण्डेय सरीखा कोई सैनिक दोबारा भारतीय शासकों के विरुद्ध बगावत न कर सके।
आज तक हमारे देश में वही ब्रिटिश परम्परा चली आ रही है। कहने को 15 अगस्त 1947 को हमारा मुल्क आजाद हो गया लेकिन रिमोट कण्ट्रोल आज भी एक विदेशी मलका के हाथ में है। शायद कोई दूसरा सैनिक ऐसी जुर्रत करे इसकी सम्भावना तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में ही छिपी हुई है। क्योंकि समय बडा बलवान होता है वह अपने हिसाब से अपना हिसाब पूरा रखता है अत: कोई कितना ही बडा बन्दोबस्त क्यों न कर ले; वक्त किसी को नहीं बख्शता। Hindaun ‪#‎bharatkaushiksharma

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