Monday, 2 November 2015

"हमको ही जलना हैं बारूद बनके इस वतन को बचाने में "

''जहाँ गाय कटती हो कत्लखानो में " बिकता माँस महँगा दुकानों में
"मिले दूध माखन नकली "कान्हा को भोग लगाने में"
क्यों कि"गौधन काटा जा रहा,विदेशों को पहुँचाने में
"और करोडो की छूट दे रही "सकरार "कत्लखाने खुलवाने में
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"जब संतोंको अनशन करना पड़ता है। गैचार भूमि बनवाने में "
"यहाँ मर गए संन्यासी सेकड़ों गौमाता को बचाने में
जहाँ कुत्ते शान से रहते दिखे "ऊँचे-ऊँचे मकानों में
"और गाय घूमती मिल जाएँ कचरे के ढेर और पखानो में"
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"असली अनाज उगता नहीं अब खेत खलिहानों में "
"दूध, दही ,मठा, हो गए दुर्लभ अब रोज़ के खानो में "
आर्थिक "संपन्नता" नहीं दिखे "मेरे देश के किसानो में
"किस मुँह से कहे की भारत बसता हैं "गाँवों " में "
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"गिनती होती नहीं यहाँ "अब इंसानो की इंसानो में
"मर जाते हैं।"सैंकड़ों" लिए उम्मीद का हक पाने में"
ईमान बिकता हैं यहाँ आज "कौड़ियों" के दामो में
"हम विश्वास करते थे जिन पर वो जा मिले बेगानो में "
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"अपनों के हाथों कैद हो रहें अपने ही मकानों में
"धर्म-कर्म पर कर लगायें सरकार हिन्दू घरानो में "
हम माफ़ करते हैं सोच के गलती हो गई अनजाने में
"और पीठ पर ही छुरा घोपना ही उनकी नियत हैं इमानो में "
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"जब पहरेदार ही सेंध ! लगाये ख़ज़ाने में "
"किस पर अब विश्वास जताएं पहरे पर बिठाने में
शहीद हो रहें" जवान भारत माँ की लाज बचाने में "
"मेरे देश के नेता आश्वासन देते ' हर बार नए बहाने में "
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"संस्कृति दम तोड़ती खड़ी मौत के मुहाने में"
और हम चीर निंद्रा में लींन पड़े मौज उड़ाने में "
"सर्वेभवन्तु सुखिनय" छोड़ लगे अपना आशियाँ सजाने में
"और" पीडी हो रही बर्बाद दूसरों के भरोसे संस्कार सिखाने में "
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"जो अपने"शाश्त्रो"की रक्षा न कर पाये इस अधर्मी ज़माने में
"क्यूँ "नारायण "अवतार में आये बनके कल्कि तुम्हे बचाने में "
आज़ाद, भगत ,की चाह हैं "सबको जन्म ले फिर से इस ज़माने में
पर नहीं चाहता हैं "कोई" वो पैदा हो मेरे घराने में "
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"चलो हम ही अपनी आहुति दे।इस बगिया को महकाने में "
"हमको ही जलना हैं बारूद बनके इस वतन को बचाने में "
*************भारत कौशिक शर्मा"**************
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